DOHA 172

तिनका कबहूँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,

कबहूँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।

MEANING

अपने इस दोहे में संत कबीरदासजी कहते हैं की एक छोटे तिनके को छोटा समझ के उसकी निंदा न करो जैसे वो पैरों के नीचे आकर बुझ जाता हैं वैसे ही वो उड़कर आँख में चला जाये तो बहोत बड़ा घाव देता हैं।