DOHA 42

माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर।

आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर।

MEANING

कबीर दास जी कहते हैं कि मायाधन और इंसान का मन कभी नहीं मरा, इंसान मरता है शरीर बदलता है लेकिन इंसान की इच्छा और ईर्ष्या कभी नहीं मरती।